सुभाष चन्द्र

सुभाष चन्द्र

लेखक · आई.टी. प्रोफ़ेशनल

जीवन के अनुभवों को ईमानदारी और सादगी से शब्द देने वाला लेखक। मेरी पहली किताब संघर्ष से सफलता तक की एक सच्ची यात्रा है।

बढ़ेगा वही, जो लड़ेगा

सुभाष चन्द्र का चित्र

परिचय

मैं एक आई.टी. प्रोफ़ेशनल और लेखक हूँ। उत्तराखंड के छोटे पहाड़ी कस्बे पुरोला से मेरी यात्रा अभावों और संघर्षों से शुरू हुई और शिक्षा, आत्मसम्मान व दृढ़ संकल्प के सहारे मुझे कॉर्पोरेट जगत तक ले आई। लगभग 15 वर्षों के आई.टी. अनुभव के साथ मैं वर्तमान में Infosys में कार्यरत हूँ।

सीमित संसाधनों के बावजूद मैंने शिक्षा को अपनी सबसे बड़ी पूँजी माना। बी.ए. के बाद कंप्यूटर शिक्षा और एम.सी.ए. से तकनीकी क्षेत्र में अपनी राह बनाई। लेखन मेरे लिए अभिव्यक्ति से बढ़कर जीवन के अनुभवों को अर्थ देने का माध्यम है, और कविता व ग़ज़ल से मेरा गहरा लगाव है।

वर्तमान
Infosys में कार्यरत, लगभग 15 वर्षों का आई.टी. अनुभव
शिक्षा
बी.ए., एम.सी.ए.
मूल
पुरोला, उत्तराखंड
लेखन
आत्मकथा, जीवन के अनुभव; कविता और ग़ज़ल में रुचि

“मेहनत और ईमानदारी से चलने वाला रास्ता भले लंबा हो, लेकिन वह इंसान को मंज़िल के साथ-साथ अपनी पहचान भी देता है।”मेरा जीवन-दर्शन

किताबें

मेरा सफ़र – किचन से कॉर्पोरेट तक

उत्तराखंड के छोटे पहाड़ी कस्बे पुरोला से Infosys जैसी कंपनी तक पहुँचने की सच्ची, प्रेरणादायक आत्मकथा। दो साल की उम्र में पिता द्वारा त्याग दिए जाने के बाद भी एक बच्चे ने भूख, अभाव और संघर्ष के बीच हार नहीं मानी।

  • प्रकाशक: अस्तित्व प्रकाशन · 2026
  • हिन्दी · पेपरबैक और ई-बुक
  • ISBN 978-93-7686-641-0

चार पड़ाव, 39 अध्याय

  1. बचपन की चौखट से
  2. संघर्षों की सीढ़ियाँ
  3. रिश्तों की रेखाएँ
  4. परिवार व पहचान

यह किताब यहाँ उपलब्ध है

पेपरबैक

ई-बुक

आगामी

तीन नई किताबें, तीन अलग विधाएँ।

आगामी · कहानी संग्रह

पचहत्तर पैसे वाली चाय

रोज़मर्रा की ज़िंदगी से निकली कहानियाँ: प्लेट में ठंडी होती चाय, एक टूटी स्लेट, 2 बी.एच.के. फ़्लैट की चारदीवारी, एक बस का सफ़र। रिश्तों, यादों, भरोसे और आत्मसम्मान की ये कहानियाँ आपको अपने आसपास की किसी न किसी ज़िंदगी की याद दिलाएँगी।

इस संग्रह की कहानियाँ

  • पचहत्तर पैसे वाली चाय
  • एक अलग लड़का
  • छठी मंज़िल
  • पत्थर की स्लेट
  • 2 बी.एच.के. फ़्लैट
  • सीट नंबर 20

प्रकाशन: जल्द घोषणा

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आगामी · उपन्यास

अज्ञात संसार

एक खोई दुनिया का राज

भारत के उत्तर-पूर्व के घने जंगलों में एक ऐसा समुदाय, जिसके अस्तित्व से बाहरी दुनिया अनजान है। जब पहली बार दो दुनियाएँ आमने-सामने आती हैं, तो सवाल सिर्फ़ डर का नहीं रह जाता: कौन किसे कितना जानता है, और जो सच अब तक छुपा था, वह सामने आए तो? रोमांच, रहस्य और इंसानियत की यह कहानी जंगल की गहराइयों से बाहरी दुनिया तक जाती है।

14 अध्याय · प्रकाशन: जल्द घोषणा

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आगामी · सामाजिक उपन्यास

लाखों बार

वो अनसुनी किलकारियाँ

“भारत की अजन्मी बेटियों की अनकही दास्तान”

यह उपन्यास एक सवाल पूछता है: वंश चलाता कौन है? 1979 से शुरू होकर एक गाँव, एक मशीन और सावित्री जैसे पात्रों के सहारे यह उन आवाज़ों तक पहुँचता है, जो कभी सुनाई नहीं दीं। पात्र काल्पनिक हैं, पर उनके पीछे की सच्चाई और ऐतिहासिक तथ्य, जैसे जनगणना के आँकड़े, PNDT अधिनियम और अख़बारों के संदर्भ, प्रामाणिक स्रोतों से लिए गए हैं।

प्रकाशन: जल्द घोषणा

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प्रशंसा

निस्संदेह, यह किसी ऊँची धार से लगाई गई ‘धै’ (आवाज़) है। इसे आपको सुनना भी होगा और इसके साथ चलना भी होगा।व्योमेश चन्द्र जुगरान, वरिष्ठ पत्रकार (भूमिका से)
  • “कभी-कभी ज़िंदगी की सबसे बड़ी समझदारी बहुत छोटी उम्र में आ जाती है।”
  • “गाय तो चली गई थी, पर उसकी किस्तें हमारे साथ रह गई थीं: उम्मीद की तरह, और बोझ की तरह भी।”
  • “यह रिश्ता किसी क़ानूनी दस्तावेज़ पर नहीं, बल्कि दिल की गहराई पर दर्ज है।”

लेख

विचार · 2 मिनट

पुरोला से दिल्ली: 10 घंटे का रास्ता, 6 साल का सफ़र

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पुरोला से दिल्ली का सफ़र भले ही 10–12 घंटों का हो, मेरे लिए उसमें छह साल लगे। उन सालों में मैंने सिर्फ़ सड़क नहीं, ख़ुद को भी पार किया। यह दूरी मीलों से ज़्यादा मौक़ों की थी, उन मोड़ों की, जो न नक़्शों में दर्ज होते हैं और न यादों से मिटते हैं।

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माँ · 2 मिनट

दो साल की उम्र में पिता ने त्याग दिया, पर माँ ने हार नहीं मानी

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जब मैं दो साल का था, पिता ने हमें त्याग दिया। बड़ा होते हुए माँ की नथुनी बिकते देखी और भूखे पेट दिन गुज़ारे, फिर भी हार नहीं मानी। माँ मेरे लिए सिर्फ़ माँ नहीं, पिता, गुरु और साथी, सब कुछ बनकर खड़ी रहीं। यह किताब उन्हीं के नाम एक चिट्ठी से शुरू होती है।

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रिश्ते · 2 मिनट

राखी का धागा, जो आज भी डाक से आता है

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इतने बरसों बाद भी राखी के दिन डाक से एक धागा आता है, आज भी उसी घर से। यह रिश्ता किसी क़ानूनी दस्तावेज़ पर नहीं, दिल की गहराई पर दर्ज है। इस किताब में ऐसे कई रिश्ते हैं, और उनमें सबसे ख़ास हैं ‘साहब’, जिन्होंने मेरी ज़िंदगी सँवारी।

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संपर्क

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