विचार · 2 मिनटपुरोला से दिल्ली: 10 घंटे का रास्ता, 6 साल का सफ़र
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पुरोला से दिल्ली का सफ़र भले ही 10–12 घंटों का हो, मेरे लिए उसमें छह साल लगे। उन सालों में मैंने सिर्फ़ सड़क नहीं, ख़ुद को भी पार किया। यह दूरी मीलों से ज़्यादा मौक़ों की थी, उन मोड़ों की, जो न नक़्शों में दर्ज होते हैं और न यादों से मिटते हैं।
पूरी कहानी किताब में पढ़ेंमाँ · 2 मिनटदो साल की उम्र में पिता ने त्याग दिया, पर माँ ने हार नहीं मानी
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जब मैं दो साल का था, पिता ने हमें त्याग दिया। बड़ा होते हुए माँ की नथुनी बिकते देखी और भूखे पेट दिन गुज़ारे, फिर भी हार नहीं मानी। माँ मेरे लिए सिर्फ़ माँ नहीं, पिता, गुरु और साथी, सब कुछ बनकर खड़ी रहीं। यह किताब उन्हीं के नाम एक चिट्ठी से शुरू होती है।
पूरी कहानी किताब में पढ़ेंरिश्ते · 2 मिनटराखी का धागा, जो आज भी डाक से आता है
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इतने बरसों बाद भी राखी के दिन डाक से एक धागा आता है, आज भी उसी घर से। यह रिश्ता किसी क़ानूनी दस्तावेज़ पर नहीं, दिल की गहराई पर दर्ज है। इस किताब में ऐसे कई रिश्ते हैं, और उनमें सबसे ख़ास हैं ‘साहब’, जिन्होंने मेरी ज़िंदगी सँवारी।
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